প্রচ্ছদ / আনন্দ/বিনোদন / ক্রিকেট ম্যাচ জিতে মাঠে সেজদা এবং ক্রিকেট খেলার হুকুম কী?

ক্রিকেট ম্যাচ জিতে মাঠে সেজদা এবং ক্রিকেট খেলার হুকুম কী?

প্রশ্ন

From: মোঃ শওকত ফরাজি
বিষয়ঃ খেলা প্রসঙ্গে

প্রশ্নঃ
আসসালামু আলাইকুম।
আমি মোঃ শওকত ফরাজি
পালের চর-শরিয়তপুর থেকে।
আহলে হক পরিবারের সকলকে মুবারকবাদ। আল্লাহ নিশ্চই আপনাদের উত্তম প্রতিদান দিবেন ইনশাল্লাহ।
প্রশ্নঃ (১) যদি কেউ খেলার স্থানে বা বিনোদনের স্থানে, বিশেষ করে ক্রিকেটের মাঠে (শরিয়্যাহ খেলাফ না করে) উক্ত খেলায় ভালো পারফরমেন্স করে শুক্রিয়া জ্ঞাপনের উদ্দেশ্যে রাব্বে কারীমের রাহে সিজদায় লুটিয়ে পড়ে, এটা শরিয়তের দৃষ্টিতে কি ঠিক?
(২) আমি আলহামদুলিল্লাহ বুঝি যে, যেসব জায়গাতে (কাজে) বৃথা সময় অপচয় হয়, সেসব কাজ থেকে বিরত থাকা অনেক উত্তম। সেই দৃষ্টিকোন থেকে ক্রিকেট খেলা কি জায়েজ? তথা ইসলাম কি বলে?
বিঃদ্রঃ আহলে হক মিডিয়ার বদৌলতে আলহামদুলিল্লাহ অনেক কিছুই জানতে পারছি। দুয়া করি আল্লাহ আপনাদের (বিশেষ করে) মুহতারাম মুফতি লুতফর রহমান ফরায়েজী দাঃবাঃ আল্লাহ উত্তম প্রতিদান দিক। #আমিন

উত্তর

وعليكم السلام ورحمة الله وبركاته

بسم الله الرحمن الرحيم

যদি বেপর্দা ও সতর খোলাসহ নিষিদ্ধ কোন বিষয় না থাকে, তাহলে শারিরীক ব্যায়াম হিসেবে ক্রিকেট খেলা জায়েজ আছে।

কিন্তু বর্তমানে ক্রিকেট পেশাদার আন্তর্জাতিক ক্রিকেট টুর্নামেন্টে বেপর্দা, জুয়াসহ অনেক হারাম বিষয় জড়িত। তাই এসব টুর্নামেন্টে ভালো পারফরমেন্স করে সেজদা দেয়ার মাঝে কোন কৃতিত্ব নেই। বরং তার উচিত উক্ত গোনাহের কাজ করার কারণে তওবা করা।

 

قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: روحوا القلوب ساعة فساعة (الجامع الصغير للسيوطى مع فيض القدير-7/415، رقم-4484)

(روحوا القلوب ساعة فساعة) وفي رواية ساعة وساعة أي أريحوها بعض الأوقات من مكابدة العبادات بمباح لا عقاب فيه ولا ثواب قال أبو الدرداء: إني لأجم فؤادي ببعض الباطل أي اللهو الجائز لأنشط للحق وذكر عند المصطفى صلى الله عليه وسلم القرآن والشعر فجاء أبو بكر فقال: أقراءة وشعر فقال: نعم ساعة هذا وساعة ذاك وقال علي كرم الله وجهه: أجموا هذه القلوب فإنها تمل كما تمل الأبدان أي تكل وقال بعضهم: إنما ذكر المصطفى صلى الله عليه وسلم لأولئك الأكابر الذين استولت هموم الآخرة على قلوبهم فخشي عليها أن تحترق (فيض القدير شرح الجامع الصغير-7/3415-3416، رقم-4484)

فالضابط في هذا … أن اللهو المجرد الذي لا طائل تحته، وليس له غرض صحيح  مفيد في المعاش ولا المعاد حرام أو مكروه تحريماً، … وما كان فيه غرض  ومصلحة دينية أو دنيوية فإن ورد النهي  عنه من الكتاب  أو السنة … كان حراماً أو مكروهاً تحريماً، … وأما مالم يرد فيه النهي عن الشارع وفيه فائدة ومصلحة للناس فهو بالنظر الفقهي على نوعين: الأول: ما شهدت التجربة بأن ضرره أعظم من نفعه، ومفاسده أغلب على منافعه، وأنه من اشتغل  به ألهاه عن ذكر الله  وحده  وعن الصلاة والمساجد، التحق ذلك بالمنهي عنه؛ لاشتراك العلة، فكان حراماً أو مكروهاً. والثاني: ماليس كذلك، فهو أيضاً إن اشتغل به بنية التهلي والتلاعب فهو مكروه، وإن اشتغل به لتحصيل تلك المنفعة وبنية استجلاب المصلحة فهو مباح، بل قد ير تقي إلى درجة الاستحباب أو أعظم منه … وعلى هذا الأصل فالألعاب التي يقصد بها رياضة الأبدان أو الأذهان جائزة في نفسها مالم يشتمل على معصية أخرى، وما لم يؤد الانهماك فيها إلى الإخلال بواجب الإنسان في دينه و دنياه (تکملة فتح المهم، قبیل کتاب الرؤیا، (4/435) ط:  دارالعلوم کراچی)

وحاصل الكلام: ترويح القلب وتفريحه، وكذا تمرين البدن من الارتفات المباحة والمصالح البشرية التى لا تمنعها الشريعة السمحة برأسها، نعم! تمنع الغلو والانهماك فيها بحيث يضر بالمعاش أو المعاد (تكملة فتح الملهم، كتاب الشعر، باب تحريم اللعب بالنردشير، حكم الألعاب فى الشريعة-4/434)

قال أبو الدرداء: إنى لأجم فؤادى ببعض الباطل: أى اللهو الجائز لأنشط للحق (فيض القدير-7/3418)

وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَشْتَرِي لَهْوَ الْحَدِيثِ لِيُضِلَّ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَيَتَّخِذَهَا هُزُوًا أُولَئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مُهِينٌ } -لقمان: 6

ولهو الحديث على ما روي عن الحسن: كل ما شغلك عن عبادة الله تعالى وذكره من السمر والأضاحيك والخرافات والغناء ونحوها (تفسیر روحالمعانى-11/66، سورة لقمان، دار الكتب العلمية)

والله اعلم بالصواب
উত্তর লিখনে
লুৎফুর রহমান ফরায়েজী

পরিচালক-তালীমুল ইসলাম ইনষ্টিটিউট এন্ড রিসার্চ সেন্টার ঢাকা।

উস্তাজুল ইফতা– জামিয়া কাসিমুল উলুম সালেহপুর, আমীনবাজার ঢাকা।

পরিচালক: শুকুন্দী ঝালখালী তা’লীমুস সুন্নাহ দারুল উলুম মাদরাসা, মনোহরদী নরসিংদী।

ইমেইল– ahlehaqmedia2014@gmail.com

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